भाषा ईश्वर द्वारा मनुष्य को दिया गया एक वरदान है क्योंकि भाषा ही मनुष्य को पशु पक्षियों से अलग बनाती है और भाषा के द्वारा ही मनुष्य अपने भावों व विचारों की अभिव्यक्ति करता है। अपने व्यक्तित्व को निखार पाता है ज्ञान हासिल कर पाता है। भाषा ही मनुष्य की समस्त मानसिक शक्तियों, भावों तथा विचारों के विकास का आधार है।
भाषा का अर्थ व परिभाषा
भाषा का अर्थ | Bhasha ka Arth
भाषा शब्द संस्कृत के भाष धातु से लिया गया है जिसका अर्थ होता है बोलना। इसका अर्थ है अपने विचारों या भावों को प्रकट करना। भाषा अपने सामान्य अर्थ में विचारों या भावों को आदान प्रदान करने का एक सशक्त माध्यम है। भाषा एक साधन है जिसके जरिए मनुष्य अपनी भावनाओं अपनी बातों को दूसरों के सामने प्रकट करता है और दूसरों की बातों को समझ लेता है।
भाषा की परिभाषा | Bhasha ki Paribhasha
भाषा के विषय में निम्नलिखित विद्वानों ने अपने विचार दिए हैं जिनमें से प्रमुख विद्वानों के विचारों का वर्णन इस प्रकार से है:-
हेनरी स्वीट के अनुसार,”जिन व्यक्त ध्वनियों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति होती है उसे भाषा कहते हैं”
पतंजलि मुनि के शब्दों में,“भाषा वह व्यवहार है जिसमें हम वर्णनात्मक अथवा व्यक्त शब्दों के द्वारा अपने विचारों को प्रकट करते हैं”
डाॅ बाबुराम सक्सेना के अनुसार,“जिन ध्वनि चिन्हों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार विनिमय करता है उसे भाषा कहते हैं”
भाषा की प्रकृति | Bhasha ki Prakriti
भाषा की प्रकृति से अभिप्राय है कि भाषा की प्रवृति, स्वभाव, आदत व गुण इत्यादि क्या है। भाषा की प्रकृति को निम्नलिखित बिंदुओं की सहायता से परिभाषित किया जा सकता है –
1. भाषा सभ्यता व संस्कृति से जुड़ी रहती है
2. भाषा एक सामाजिक प्रक्रिया है
3. कठिनता से सरलता की ओर
4. भाषा एक सांकेतिक साधन है
5. भाषा तथा विचारों में घनिष्ठ संबंध
6. भाषा रीति रिवाज से संबंधित
7. भाषा अर्जित संपत्ति है
8. भाषा का ज्ञान अनुकरण द्वारा
9. प्रत्येक भाषा की अपनी अलग-अलग पहचान
10. भाषा की अपनी भौगोलिक सीमा
11. भाषा समाज सापेक्ष प्रक्रिया है
12. गतिशील और परिवर्तनशील
13. भाषा का कोई अंतिम स्वरूप नहीं है
14. भाषा में यादृच्छिकता होती हैं
1. भाषा सभ्यता व संस्कृति से जुड़ी रहती है :- भाषा एक संस्कृति है उसके भीतर सदियों की जीवन पद्धति,भावनाएं और विचार समाहित होते हैं। किसी भी समाज की सभ्यता व संस्कृति की झलक व्यक्ति की भाषा में मिल जाती है। जैसे तमिल भाषा जहां तमिलनाडु राज्य की संस्कृति और सभ्यता तथा वहां के लोगों के व्यवहार और आचरण को मुखरित करती है वैसे ही पंजाबी भाषा पंजाब राज्य की संस्कृति और सभ्यता को उजागर करती है। भाषा के माध्यम से ही सभ्यता व संस्कृति का पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता है।
2. भाषा एक सामाजिक वस्तु है :- भाषा का सीधा संबंध मानव समाज से है समाज में ही भाषा की उत्पत्ति होती है और समाज में ही भाषा का विकास होता है। समाज में रहकर ही मनुष्य भाषा सीखता है। समाज से बाहर रहकर मनुष्य भाषा नहीं सीख सकता है। जब बच्चा बच्चा छोटा होता है तो वह अपने माता-पिता की सहायता से भाषा का प्रयोग करना सीखता है जैसे पंजाब में पैदा होने वाला बच्चा अपने माता-पिता व समाज की सहायता से पंजाबी भाषा सीखता है।
3. कठिनता से सरलता की ओर :- भाषा का सदन क्रमिक विकास होता है और इस विकास में भाषा की कठिनता से सरलता की ओर उन्मुख रहने की प्रवृत्ति सदैव बनी रहती है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह कठिन मार्ग को छोड़कर सरल मार्ग पर चलकर आगे बढ़ना चाहता है। बच्चा जब छोटा होता है तब अपने माता-पिता और आसपास के लोगों से भाषा बोलना सीखता है और पहले सरल शब्दों को सीखता है बाद में शब्दों की ध्वनियों , वाक्य रचना का ज्ञान हासिल करता है। इस प्रकार वह कठिनता से सरलता की ओर जीवन में आगे बढ़ता हैं।
4. भाषा एक सांकेतिक साधन है :- भावों और विचारों को प्रकट करने के लिए भाषा को सांकेतिक साधन के रूप में जाना जाता है। भाषा प्रणाली मनुष्य रूपों से प्रतीकों से बनी है संकेत एक ऐसी चीज है जो किसी वस्तु का प्रतिनिधित्व करती है जिसे लिखित रूप से संप्रेषित किया जा सकता है। सांकेतिक साधनों के द्वारा समाज के लोग अपने विचारों का परस्पर आदान-प्रदान करते हैं।
5. भाषा तथा विचारों में घनिष्ठ संबंध :- भाषा तथा विचारों में घनिष्ठ संबंध है क्योंकि भाषा विचारों की जननी है तथा विचारों का सही प्रयोग भाषा के माध्यम से ही हो सकता है। विचार ही भाषा को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। मनुष्य के अलावा बाकी शेष प्राणियों की अपनी भाषा होती है लेकिन विचारों के अभाव के कारण उतना मूल्य नहीं होता।
6. भाषा रीति रिवाज से संबंधित :- भाषा परंपरागत है क्योंकि यह सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है हम सब इसे अर्जित करते हैं। हम और हमारी पीढ़ी वर्तमान में इसके स्वरूप में थोड़ा बहुत ही परिवर्तन ला पाते हैं पहले से चली आ रही भाषा के स्थान पर बिल्कुल नई भाषा नहीं लाई जा सकती है क्योंकि परंपरा द्वारा इसे आगे की पीढ़ी को सौंपा जाता है।
7. भाषा अर्जित संपत्ति है :- कोई भी बच्चा जन्म के साथ ही भाषा लेकर नहीं आता है। वह भाषा को अर्जित करता है। छोटा बच्चा आरंभ से ही अपने माता-पिता व समाज से भाषा को सीखता है। बच्चा भाषा को स्वयं के प्रयासों तथा भाषा को सीख सकने वाली वातावरण व अन्य परिस्थितियों से प्राप्त करता है इसलिए यह पैतृक ना होकर अर्जित संपत्ति है। भारत में पैदा होने वाला बच्चा फ्रांस में रहकर इसलिए फ्रेंच बोलने लगता है क्योंकि उसके चारों ओर का वातावरण फ्रेंच भाषा का रहता है।
8. भाषा का ज्ञान अनुकरण द्वारा :- भाषा को अनुकरण द्वारा सीखा जा सकता है बच्चा अपने आसपास के वातावरण से जो भाषा दूसरों को प्रयोग करते या बोलते हुए सुनता है लिखते हुए देखता है उसे ही नकल द्वारा सीखने का प्रयास करता है शिशु के समक्ष मां दूध कहती है वह सुनता है धीरे-धीरे उसे स्वयं कहने का प्रयास करता है। इस प्रकार बच्चा प्रारंभ में नकल करने से ही भाषा बोलना सीखता है बाद में विद्यालय में उनके भाषा ज्ञान को बढ़ाया जाता है।
9. प्रत्येक भाषा की अपनी अलग-अलग पहचान :- हर भाषा की अपनी अलग पहचान होती है। प्रत्येक भाषा की अपनी शब्द, ध्वनियां तथा वाक्य संरचना होती है जो उसे दूसरी भाषाओं से अलग करती है प्रत्येक भाषा का अपना अलग ढांचा होता है जैसे प्रत्येक व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व होता है वैसे ही भाषा की भी अपनी अलग पहचान होती हैं।
10. भाषा की अपनी भौगोलिक सीमा:- प्रत्येक भाषा की अपनी भौगोलिक सीमा होती है जिसके भीतर ही उसे अच्छी तरह बोला, लिखा और समझा जा सकता है उस क्षेत्र या सीमा से बाहर निकलते ही उसके स्वरूप में थोड़ा बहुत परिवर्तन आना शुरू हो जाता है। क्योंकि उससे बाहर किसी अन्य भाषा की सीमा या क्षेत्र शुरू हो जाता है।
11. भाषा समाज सापेक्ष प्रक्रिया है :- भाषा का विकास समाज में ही संभव है बच्चा परिवार व समाज में रहकर ही भाषा का प्रयोग करता है। और समाज से जुड़कर उसकी भाषा में विकास होता जाता है भाषा के फलस्वरुप ही वह भाषा से जीवन पर्यंत जुड़ा रहता है।
12. गतिशील और परिवर्तनशील :– भाषा गतिशील और परिवर्तनशील है जब से भाषा का उद्गम हुआ है बहती हुई नदी की तरह इसकी प्रभावशीलता में कोई अंतर नहीं आया है आज भाषा का जो स्वरूप है वह पहले नहीं था और आने वाले समय में ऐसा नहीं रहेगा। समय के साथ इसके शब्द रूप में परिवर्तन आता रहता है लेकिन संपूर्ण तौर पर परिवर्तन नहीं आता है।
13. भाषा का कोई अंतिम स्वरूप नहीं है :– जब कोई वस्तु बनकर तैयार हो जाती है तो वही उसका अंतिम स्वरूप होता है। लेकिन भाषा के संबंध में यह बात नहीं कहीं जा सकती है। समय के साथ भाषा के कुछ शब्द लुप्त हो जाते हैं और नए शब्द प्रचलित हो जाते हैं। उदाहरण के लिए सन् 1930-1935 के आस पास थानेदार को जमादार कहा जाता था लेकिन आज इस शब्द का नया अर्थ ग्रहण किया गया है।
14. भाषा में यादृच्छिकता होती हैं :- यादृच्छिक का अर्थ होता है जैसी इच्छा हो या माना हुआ। किसी वस्तु के लिए किस शब्द का प्रयोग किया जाए यह प्रत्येक समाज की अपनी-अपनी भाषा पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए प्रत्येक समाज में पानी का प्रयोग होता है परंतु इसके लिए प्रत्येक भाषा में अलग शब्द का प्रयोग होता है। जैसे अंग्रेजी भाषा में वाटर, रूसी में बदा, हिंदी में जल या पानी कहा जाता है। भाषा में यदि यादृच्छिकता नहीं होती तो प्रत्येक भाषा में एक वस्तु के लिए एक ही ध्वनि या शब्द का प्रयोग होता।
निष्कर्ष :- निष्कर्ष के तौर पर हम कर सकते हैं कि भाषा ही वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी भावनाओं व विचारों का आदान-प्रदान करता है। भाषा के माध्यम से ही मनुष्य समाज के साथ जीवन पर्यंत जुड़ा रहता है। भाषा के द्वारा ही सभ्यता और संस्कृति का पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण होता है। भाषा की प्रकृति परिवर्तनशील और गतिशील है जो समय व परिस्थितियों के साथ थोड़ी बहुत पर बदल जाती है।
