सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जीवन |suryakant tripathi Nirala ka jivan parichay
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला(Suryakant Tripathi Nirala) मुक्तछंद के प्रवर्तक माने जाते हैं निराला कवि उपन्यासकार, कहानीकार और निबंध लेखक ही नहीं बल्कि हिंदी की नई काव्य धारा के प्रवर्तक और क्रांतिकारी विचारों के नायक थे निराला का जन्म सन 1898 ईस्वी में बंगाल के मेदिनीपुर जिले के महिषादल गांव में हुआ था। निराला के पिता का नाम पंडित राम सहाय त्रिपाठी था जो महिषादल राज्य के सामान्य कर्मचारी थे निराला के बचपन का नाम सूर्य कुमार था 3 वर्ष की अल्पायु में ही इनकी माता जी का निधन हो गया।

14 वर्ष के आयु में इनका विवाह मनोहरा देवी से हुआ। निराला का पारिवारिक जीवन कोई विशेष रूप से सुखी नहीं था उनके परिवार में एक के बाद एक मौत होती रही। परंतु फिर भी यह विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करते रहे। आर्थिक संकटों से जूझते हुए भी जिंदगी में आगे बढ़ते रहे। इन्होंने कुछ दिनों तक नौकरी की। इसके अतिरिक्त कुछ समय तक समन्वय और मतवाला पत्र से भी जुड़े रहे। पुत्री सरोज के बड़े होने पर उसका निधन हो गया। सरोज की मृत्यु ने तो इनके हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। पुत्री की मृत्यु होने ने निकाला को झकझोर कर रख दिया। अंत में संघर्षों से जूझते हुए 15 अक्टूबर 1961 को निराला जी का निधन हो गया।
उपन्यास:- इरावती, बिल्लेसुर, बकरिहा, रतिनाथ की चाची।
भाषा शैली:- निराला की भाषा संस्कृत है इन्होंने उर्दू, फारसी के शब्दों का बहिष्कार भी नहीं किया है। उनके काव्य में ओज की मात्रा अधिक है यही नहीं निराला की भाषा सदैव भावों के अनुसार बदलती है इनकी यह शैली बांग्ला शैली से प्रभावित है इनके काव्य विभिन्न अलंकारों से अलंकृत है संगीतात्मकता तथा गेयता तथा इस शैली की अतिरिक्त विशेषताएं है उनमें संगीत का स्वर भाषा के प्रवाह और अर्थ संघनता उनकी काव्य भाषा की विशेषता है जूही की कली, राम की शक्ति पूजा जैसे कविताएं छंद में लिखी हुई है निराला ने अपने काव्य में गजल, लोकगीत आदि का ही प्रयोग किया है।
