क्षेत्रीय दलों से अभिप्राय ऐसे दल से है जिसका अस्तित्व सारे राज्यों में न होकर किसी एक विशेष राज्य में होता है और मुख्य रूप से क्षेत्रीय दल किसी विशेष राज्य, क्षेत्र, भाषा, संस्कृति या स्थानीय मुद्दों का प्रतिनिधित्व करते हैं।भारत में चुनाव आयोग क्षेत्रीय दलों को मान्यता देता है। वर्तमान 2025 तक भारत में चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दलों की संख्या लगभग 58 है।
क्षेत्रीय दलों के उदय के कारण | kshetriya dalon ke Uday ke Karan
भारत में बहुदलीय प्रणाली है अप्रैल में 2014 में हुए 16वीं लोकसभा के चावन के समय राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की संख्या तो केवल 6 ही थी लेकिन क्षेत्रीय और राज्य स्तर के राजनीतिक दलों की संख्या 39 थी यह दलवाह जी ने चुनावियों की मान्यता प्राप्त थी वर्तमान में यह संख्या 58 है
1. नस्लीय या सांस्कृतिक तथ्य
2. धार्मिक तथ्य
3. आर्थिक असमानता
4. राजनीतिक नेताओं की शक्ति के लिए लालसा
5. बढ़ रहे केंद्रवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया
6. राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के निर्बल आधार
7. राजनीतिक दलों में फूट

1. नस्लीय या सांस्कृतिक तथ्य- भारत एक ऐसा देश है जिसमें कई नस्लों या जाति या सांस्कृतिक संप्रदाय के लोग निवास करते हैं प्रत्येक जाति या सांस्कृतिक संप्रदाय को अपनी विशेष संस्कृति से विशेष लगाव होता है इतने बड़े विशाल देश में उनका सांस्कृतिक अस्तित्व महत्वहीन बन सकता है। उनकी संस्कृति धीरे-धीरे बहुसंख्यक की संस्कृति में ही सम्मिलित हो जाए इस डर से क्षेत्रीय दलों का उदय होता है। तमिलनाडु में डीएमके, झारखंड राज्य में झारखंड दल, मिजोरम में मिजो राष्ट्रीय मोर्चा , पश्चिम बंगाल में गोरखा राष्ट्रीय स्वतंत्र मोर्चा, आदि राजनीतिक दलों के ही उदाहरण है जिनका निर्माण नस्लीय या जाति या सांस्कृतिक आधार पर हुआ है।
2. धार्मिक तथ्य- भारत एक बहुधर्मी देश है यहां हिंदुओं की बहुसंख्या है और उनके अतिरिक्त कई अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक भी निवास करते हैं कुछ धार्मिक अल्पसंख्यकों को यह संदेह है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में उनका स्वतंत्र धार्मिक अस्तित्व संकट में पड़ सकता है इस संभाविक संकट से बचने के लिए कुछ धार्मिक अल्पसंख्यकों के नेताओं ने अपने धर्म के आधार पर ऐसे राजनीतिक दल निर्मित किए है जिन्हें क्षेत्रीय दल कहते हैं।
3. आर्थिक असमानताएं – भारत के विभिन्न क्षेत्रों का आर्थिक विकास एक जैसा नहीं है कई क्षेत्र आर्थिक रूप में अत्यधिक विकसित और कुछ अन्य क्षेत्र अत्यधिक पिछड़े हुए हैं क्षेत्रीय आर्थिक असमानताएं भी क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के निर्माण का कारण बनी है राष्ट्रीय राजनीतिक दल उनके समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता है उनका समाधान में स्थानीय राजनीतिक दल द्वारा किया जा सकता है यह असमानताएं भी क्षेत्रीय दलों के उदय कारण बना है।
4. राजनीतिक नेताओं की शक्ति के लिए लालसा- राजनीतिक नेता शक्ति को ग्रहण करने के लिए हमेशा इच्छुक होते हैं लोगों की भाषायी धार्मिक और क्षेत्रीय असमानताओं का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं। ताकि किसी क्षेत्रीय राजनीतिक दल का संगठन किया जा सके।ऐसे नेता सामान्यतः राजनीतिक दल का गठन कर लेते हैं ऐसे राजनीतिक दलों में राष्ट्रीय जनता जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल आदि प्रमुख है
5. बढ़ रहे केंद्रवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया- इस संदर्भ में कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश में केंद्रवाद की प्रकृति अत्यधिक बढ़ रही है कई क्षेत्रीय राजनीतिक दल इस प्रकृति के प्रतिकम के रूप में अस्तित्व में आए है एक फिल्म अभिनेता श्री एन टी सभाराव ने लोगों में सशवत प्रचार किया कि कांग्रेस की राज्य सरकार उनकी समस्या का समाधान नहीं कर सकती। सरकार को दिल्ली के आदेशों के अनुसार कार्य करना है। इस प्रवृत्ति के कारण ही राज्यों को अत्यधिक शक्ति देने की मांग बल पकडती जा रही है जिसके कारण क्षेत्रीय दलों का राज्यों में उदय हो रहा है।
6. राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के निर्बल आधार- हमारे देश के राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की स्थिति भी अद्भुत है इनमें अधिकांश राजनीतिक दलों का प्रभाव कुछ संख्या के राज्यों तक की सीमित है भारतीय मार्क्सवादी, साम्यवादी दल एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल है परंतु इसका प्रभाव विशेषता पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा तक ही सीमित है राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी केवल महाराष्ट्र नागालैंड तक ही सीमित है जिनका प्रवाह क्षेत्र बहुत ही सीमित है राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के निर्बल आधार ने भी क्षेत्रीय दलों के विकास को प्रोत्साहित किया है
7. राजनीतिक दलों में फूट – क्षेत्रीय राज्य स्तर के दलों के निर्माण का एक अन्य कारण राजनीतिक दलों से आंतरिक फुट का भी होना है। राजनीतिक दलों में फुट के कारण भी क्षेत्र दलों का उदय देखने को मिलता है जैसे कांग्रेस या जनता दल के फूट पड़ने के कारण कई क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ है।

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