एसिड अटैक किसी एक चेहरे पर नहीं, बल्कि उस पूरे समाज पर काला धब्बा है जो संवेदनशीलता और सभ्यता का दावा करता है। लेकिन आज भी महिलाएं और लड़कियां इस अमानवीय क्रूरता का शिकार हो रही हैं, जो हमारे संवेदनशील समाज और कानून व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

इस हैवानियत का अंदाजा हाल ही में जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। वर्ष 2023 में भारत में 207 एसिड हमले दर्ज किए गए, जबकि वर्ष 2022 में यह संख्या 202 थी। यह आंकड़े बताते हैं कि सख्त कानून होने के बावजूद इस तरह की घटनाएं रुक नहीं रही हैं। प्रतिशोध के भय और सामाजिक दबाव के कारण कई मामले दर्ज ही नहीं हो पाते, जिससे वास्तविक संख्या इससे भी अधिक हो सकती है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि सख्त कानून होने के बावजूद भी ऐसी घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। इसके पीछे मुख्य कारण एकतरफा प्रेम, बदले की भावना, कानून का सही तरीके से पालन न होना और एसिड तक आसान पहुंच जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं।भारतीय न्याय संहिता की धारा 124 के अंतर्गत एसिड हमले को एक विशिष्ट और गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इस धारा के तहत दोषी को न्यूनतम 10 वर्ष के कारावास से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।
साथ ही अदालत अपराधी पर ऐसा न्यायसंगत जुर्माना भी लगा सकती है, जिससे पीड़ित के उपचार और पुनर्वास का खर्च पूरा किया जा सके। इसके अतिरिक्त विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत एसिड हमले के पीड़ितों और उनके उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता के आधार पर निःशुल्क विधिक सहायता, परामर्श और सहयोग प्रदान करने का प्रावधान है, ताकि पीड़ित न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना न करें।इसके साथ ही सरकार को पीड़ितों के उपचार, पुनर्वास और शिक्षा की उचित व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि वे सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकें।
न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (2013) की सिफारिशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की भावना विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। तभी हम ऐसे अमानवीय अपराधों पर प्रभावी रोक लगा सकते हैं और अपनी माताओं, बहनों और बेटियों को इस भय से मुक्त कर सच्चे अर्थों में एक सुरक्षित, सभ्य और संवेदनशील समाज की ओर अग्रसर हो सकते हैं।अगर अब भी ऐसी घटनाओं पर कठोर रोक नहीं लगाई गई, तो हर साल न जाने कितनी और लक्ष्मी अग्रवाल इस दर्द और भय को झेलेंगी, और कड़े कानून के साथ-साथ समाज की सोच में परिवर्तन लाना आवश्यक है, तभी हम एक संवेदनशील और सभ्य समाज की कल्पना कर सकते हैं।
✍️अभिषेक कुमार स्वतंत्र लेखक
khanika Pathshala
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