हरित क्रांति क्या है – अर्थ, प्रमुख परिणाम और राजनीतिक प्रभाव (UPSC / Class 12 Notes)

हरित क्रांति के परिणाम

हरित क्रांति के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित हैं:

1️⃣ हरित क्रांति के परिणामस्वरूप भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हुआ।

2️⃣ भारत तीव्र कृषिगत विकास करने वाले राष्ट्रों में अग्रणी बन गया।

3️⃣ स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर 1977 तक लगभग 30 वर्षों में कृषि उत्पादन क्षमता में लगभग 30% वृद्धि हुई।

4️⃣ हरित क्रांति के दौरान उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का प्रयोग किया गया, जिससे उत्पादन में भारी वृद्धि हुई।

5️⃣ उन्नत उर्वरकों एवं आधुनिक कृषि उपकरणों का व्यापक उपयोग हुआ, जिससे कृषि को व्यवसाय के रूप में देखा जाने लगा।

6️⃣ उर्वरकों, कीटनाशकों तथा अन्य रसायनों की मांग बढ़ी, जिससे औद्योगिक विकास एवं रोजगार के नए अवसर उत्पन्न हुए।

7️⃣ सिंचाई सुविधाओं के विस्तार हेतु बड़े बाँधों एवं नहरों का निर्माण किया गया।

8️⃣ भारत विदेशी ऋणों की अदायगी करने में अधिक सक्षम हुआ तथा अंतर्राष्ट्रीय साख में वृद्धि हुई।

9️⃣ भारतीय कृषकों के श्रम एवं तकनीकी दक्षता को विदेशों में भी सराहा गया।

🔟 पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की जीवन शैली में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिला।

हरित क्रांति के राजनीतिक प्रभाव | UPSC / Class 12 Notes

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि समृद्धि के साथ-साथ दुष्परिणाम भी सामने आते हैं। भारत में 1960 के दशक में आरंभ हुई हरित क्रांति के कई महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव देखने को मिले। इन प्रभावों का विवरण निम्नलिखित है:

हरित क्रांति के प्रमुख राजनीतिक प्रभाव

1. पंचवर्षीय योजनाओं की प्राथमिकताओं में परिवर्तन

भारत में उत्पन्न खाद्य संकट को दूर करने के लिए हरित क्रांति का शुभारंभ किया गया। इस कालावधि में लागू होने वाली चौथी पंचवर्षीय योजना को कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया तथा इसके स्थान पर तीन वार्षिक योजनाएँ लागू की गईं।

2. राजनीतिक अस्थिरता का दौर

हरित क्रांति के समय ही केंद्र एवं राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। 1967 के आम चुनावों में कांग्रेस को पहली बार साधारण बहुमत पर निर्भर रहना पड़ा। कांग्रेस को कुल 520 में से 283 सीटें प्राप्त हुईं।

3. दल-बदल की राजनीति का उदय

1967 के पश्चात भारतीय राजनीति में दल-बदल की प्रवृत्ति बढ़ी। कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें गठित हुईं, जिनमें निर्दलीय एवं छोटे दलों के नेता भी शामिल थे।

4. गठबंधन सरकारों का उदय

अनेक राज्यों में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण गठबंधन सरकारें बनीं। ये सरकारें स्थिर प्रशासन देने में प्रायः असफल रहीं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी।

5. भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ

इस काल में राजनीति में भ्रष्टाचार के प्रसार की चर्चा बढ़ी। प्रशासन पर नौकरशाही का प्रभाव अधिक हुआ तथा लालफीताशाही को प्रोत्साहन मिला। जीप घोटाला एवं नहर घोटाला जैसे मामले सामने आए।

6. वामपंथी दलों का विरोध

हरित क्रांति से पूर्व अपनाई गई कुछ आर्थिक नीतियों के कारण केंद्र सरकार को वामपंथी दलों के विरोध का सामना करना पड़ा।

7. क्षेत्रीय असंतुलन

हरित क्रांति का लाभ मुख्यतः पंजाब, हरियाणा एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहा। इससे क्षेत्रीय एवं सामाजिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हुई।

8. कांग्रेस में विभाजन (1969)

1969 में कांग्रेस में फूट पड़ी, जिसके परिणामस्वरूप पार्टी दो भागों में विभाजित हो गई। यह घटना भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई।

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