भारत विभाजन को टाला जा सकता था या नहीं? यह एक विवाद का विषय है। इस विषय पर दो तरह के विचार है कुछ लोगों का मानना है भारत विभाजन को टाला जा सकता था अगर पंडित जवाहरलाल नेहरू और पटेल माउंटबेटन योजना से सहमत न होते। लेकिन कुछ लोगों का मानना है बढ़ती सांप्रदायिक भावना के कारण भारत विभाजन को नहीं टाला जा सकता था। क्योंकि इसके पीछे अंग्रेजों की फूड डालो राज करो की नीति थी।
Kya Bharat ke vibhajan ko Tala ja sakta tha
1. मौलाना आजाद के विचार:- यह एक वाद-विवाद का विषय था मौलाना आजाद इस विचार के समर्थक है कि यदि लॉर्ड माउंटबेटन के प्रभावाधीन सरदार पटेल और पंडित नेहरू देश के विभाजन से सहमत न होते तो देश का विभाजन टाला जा सकता था मौलाना आजाद के कथन अनुसार लॉर्ड माउंटबेटन के भारत में आने के 1 महीने अंदर पंडित नेहरू ने विभाजन के प्रति अपना विचार बदल दिया था।
2. अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति:- अंग्रेज 1857 ईस्वी के स्वतंत्रता संग्राम को मुसलमानों की साजिश समझते थे इसलिए उन्होंने मुसलमान को दबाया और हिंदुओं को विशेष सुविधाएं और सरकारी उच्च पद दिए ।भारत की सांप्रदायिक एकता को नष्ट करने की अंग्रेजों की यह पहली कुचाल थी 1909 ई के मार्ले मिंटो सुधार के अधीन मुसलमान को विशेष सुविधाएं देकर हिंदुओं को दबाने का यत्न किया गया। इस प्रकार अंग्रेजों की फूट डालो राज करो की नीति ने हिंदू और मुसलमान के बीच गहरी खाई बनाने का काम किया। और जब जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग की सांप्रदायिक भावना ने बल पकडा।
3. सांप्रदायिकता:- प्रसिद्ध समाज शास्त्री संध्या जुनेजा ने अपनी पुस्तक 1947 में “भारत का विभाजन एक ऐतिहासिक भूल” में लिखा है कि जिन्ना के ऊपर मुस्लिम सांप्रदायिक का रंग इतना गहरा चढ़ गया था वह हिंदू मुस्लिम सांप्रदायिकता का एकमात्र हल पृथक राष्ट्र की स्थापना को मानते थे 4 अक्टूबर 1944 को एक साक्षात्कार में जिन्ना ने कहा था कि मुसलमान हिंदुओं के झगड़े के निदान के एकमात्र व्यवहारिक व यथार्थवादी उपाय भारत विभाजन है।
4. लीग के हट के कारण विभाजन नहीं डाला जा सकता था:- जहां तक मौलाना आजाद के इस विचार का संबंध है कि यदि कांग्रेस मुस्लिम लीग के साथ मिलकर मंत्रिमंडल का निर्माण कर लेती है तो देश की स्थिति बिगड़ने से बच सकती थी हमारा यह मत है कि 1946 ईस्वी में अंतरिम सरकार में कांग्रेस को मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों के साथ कार्य कार्य यह विश्वास भी हो गया था कि मुस्लिम लीग से मिलकर शासन चलाना लगभग असंभव था 9 दिसंबर 46 को संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन हुआ था मुस्लिम लीग विभाजन की मांग पर अटल थी। जिससे स्थितियां बिगड़ रही थी।
निष्कर्ष:- निष्कर्ष के तौर पर हम कर सकते हैं कि भारत विभाजन को टालना असंभव तो नहीं था लेकिन बढ़ती सांप्रदायिक भावना को रोकना उसमें की उपस्थितियों के अनुसार कठिन था क्योंकि उस समय भारत सुदृढ़ शक्ति में नहीं था।
